Shri Devaram Ji Maharaj: Difference between revisions

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82 वर्ष की आयु में '''आषाढ़ वदी 2, संवत् 2053''' को रात्रि लगभग सवा ग्यारह बजे वे ब्रह्मलीन हो गए।
82 वर्ष की आयु में '''आषाढ़ वदी 2, संवत् 2053''' को रात्रि लगभग सवा ग्यारह बजे वे ब्रह्मलीन हो गए।


उनकी समाधि शिकारपुरा धाम में संत श्री राजारामजी महाराज के मंदिर के सामने उत्तर दिशा में लगभग पचास मीटर की दूरी पर स्थित है।
उनकी समाधि शिकारपुरा धाम में संत श्री राजारामजी महाराज के मंदिर के सामने उत्तर दिशा में लगभग पचास मीटर की दूरी पर स्थित है। इनके बाद गुरु गादी की तीसरी पीढ़ी के रूप मे '''[[Shri Kishnaram Ji Maharaj|श्री किशनाराम जी महाराज]]''' ने समाज की सेवा की।


== व्यक्तित्व और विचार ==
== व्यक्तित्व और विचार ==

Latest revision as of 09:48, 9 June 2026


संत श्री देवाराम जी महाराज

जन्म श्रावण सुदी 14, संवत् 1972
जन्म स्थान दुन्दाड़ा, लूणी, जोधपुर, राजस्थान, भारत
निवास शिकारपुरा धाम, लूणी, जोधपुर, राजस्थान
व्यवसाय संत, आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक
पिता श्री हरारामजी
माता श्रीमती धनीबाई


संत श्री देवाराम जी महाराज राजस्थान की संत परंपरा के प्रमुख संतों में से एक थे। वे शिकारपुरा धाम के प्रतिष्ठित महंत, आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक तथा जनसेवक के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन गुरु सेवा, धर्म प्रचार, मानव कल्याण और समाज सुधार के कार्यों में समर्पित कर दिया। संत श्री राजारामजी महाराज के उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने शिकारपुरा धाम को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया तथा समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाए।

जन्म, प्रारंभिक जीवन और परिवार

संत श्री देवाराम जी महाराज का जन्म श्रावण सुदी 14, संवत् 1972 को राजस्थान के जोधपुर जिले की वर्तमान लूणी तहसील के दुन्दाड़ा गाँव में काग गोत्र के एक साधारण कलबी किसान परिवार में हुआ था।

उनके पिता का नाम श्री हरारामजी तथा माता का नाम श्रीमती धनीबाई था। उनकी माता जालोर जिले की आहोर तहसील के बरवा गाँव निवासी श्री खीमारामजी बग की एकमात्र संतान थीं।

उनके दो बड़े भाई थे। सबसे बड़े भाई का नाम श्री गुलारामजी तथा दूसरे बड़े भाई का नाम श्री रावतरामजी था। उनकी कोई सगी बहन नहीं थी।

उनके दादाजी श्री तुलछारामजी मूलतः बाड़मेर जिले की सिवाना तहसील के रामपुरा खेड़ा गाँव में रहते थे, किन्तु स्थानीय सामंतों से मतभेद होने के कारण वे परिवार सहित दुन्दाड़ा आकर बस गए थे।

बाल्यकाल और बीमारी

बाल्यकाल में ही संत देवाराम जी महाराज के जीवन में अत्यंत कठिन परिस्थितियाँ आईं। संवत् 1975 में फैली महामारी में उनकी माता श्रीमती धनीबाई का निधन हो गया।

इसके कुछ वर्षों बाद संवत् 1978 के ज्येष्ठ मास में वे लकवा (पक्षाघात) से ग्रस्त हो गए। इस बीमारी के कारण उनके नाभि के नीचे का पूरा शरीर निष्क्रिय हो गया और उनका चलना-फिरना लगभग असंभव हो गया।

उनके पिता ने अनेक वैद्यों, हकीमों तथा पारंपरिक उपचारों का सहारा लिया, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। बाद में उन्हें दुन्दाड़ा गाँव की पाठशाला में महाजनी शिक्षा के लिए भेजा गया। उनके पिता प्रतिदिन उन्हें कंधों पर बैठाकर विद्यालय पहुँचाते थे।

संत श्री राजारामजी महाराज से भेंट

इसी दौरान संत श्री राजारामजी महाराज शिकारपुरा धाम में निवास कर रहे थे और अनेक असाध्य रोगों के उपचार के लिए प्रसिद्ध थे।

देवझूलनी ग्यारस के अवसर पर उनके पिता उन्हें शिकारपुरा लेकर गए। संत श्री राजारामजी महाराज ने बालक देवा को देखकर उनके पिता से कहा—

"तुम्हारे तो दो ही काफी हैं, इस एक को मुझे दे दो। अगर इसका भाग्य होगा तो यह चंगा हो जाएगा, नहीं तो राम नाम जपता रहेगा और यहाँ का खीचड़ा खाता रहेगा।"

उनके पिता ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और बालक देवा को शिकारपुरा धाम में छोड़ दिया।

स्वास्थ्य लाभ और शिक्षा

शिकारपुरा धाम में कुछ दिनों तक संत श्री राजारामजी महाराज ने उनकी स्थिति का अध्ययन किया। बाद में उन्हें एक विशेष औषधि दी गई, जिसके प्रभाव से धीरे-धीरे उनके पैरों में चेतना लौटने लगी।

कुछ दिनों के उपचार के बाद वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए। इसके बाद संत श्री राजारामजी महाराज ने उनके लिए स्लेट और पुस्तकें मंगवाईं तथा मंदिर के पुजारी के माध्यम से उनकी शिक्षा की व्यवस्था की।

कुछ समय बाद वे अपने पिता के साथ घर लौटे, लेकिन पुनः लकवाग्रस्त हो गए। बाद में संत श्री राजारामजी महाराज के निर्देशानुसार उन्होंने दुन्दाड़ा में महाजनी शिक्षा पूर्ण की और संवत् 1984 में पुनः शिकारपुरा धाम पहुँच गए।

गुरु सेवा और आध्यात्मिक जीवन

शिकारपुरा लौटने के बाद उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन प्रारंभ किया। वे ग्रंथों का सार अपने गुरु को सुनाते तथा भजन, गीत, कथा और प्रवचन के माध्यम से गुरु के उपदेशों का प्रचार करते थे।

वे आश्रम में आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा करते, भोजन व्यवस्था संभालते, पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करते तथा आश्रम परिसर की स्वच्छता बनाए रखते थे।

उनका अधिकांश जीवन गुरु सेवा, साधना और आश्रम व्यवस्था में व्यतीत हुआ।

उत्तराधिकारी के रूप में चयन

संत श्री राजारामजी महाराज ने अपने जीवनकाल में किसी भी शिष्य को औपचारिक रूप से मुंडित चेला नहीं बनाया था। उनका मानना था कि उत्तराधिकारी का चयन योग्यता और जनस्वीकृति के आधार पर होना चाहिए।

श्रावण वदी 14 संवत् 2000 को संत श्री राजारामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात आयोजित भंडारे में उपस्थित श्रद्धालुओं और भक्तों ने सर्वसम्मति से संत देवाराम जी महाराज को सबसे योग्य उत्तराधिकारी माना और उन्हें चादर ओढ़ाकर शिकारपुरा धाम का महंत नियुक्त किया।

इसके बाद वे महंत श्री देवाराम जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए।

महंत के रूप में कार्य

महंत बनने के बाद उन्होंने आश्रम की गतिविधियों का व्यापक विस्तार किया।

उन्होंने:

  • कुत्तों को दिए जाने वाले खीच की मात्रा बढ़ाई।
  • पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था विस्तारित की।
  • श्रद्धालुओं के लिए भोजन व्यवस्था को बेहतर बनाया।
  • रोगियों के उपचार हेतु औषधीय सहायता उपलब्ध करवाई।
  • आश्रम में सेवा और जनकल्याण के कार्यों का विस्तार किया।

प्रारंभिक वर्षों में आश्रम आर्थिक कठिनाइयों से गुज़रा, किन्तु उनकी निष्ठा और समर्पण के कारण श्रद्धालुओं का विश्वास बढ़ता गया।

समाज सुधार कार्य

संत देवाराम जी महाराज केवल धार्मिक संत ही नहीं बल्कि समाज सुधारक भी थे।

उन्होंने समाज में फैली अनेक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाए, जिनमें प्रमुख थे—

  • बाल विवाह का विरोध
  • मृत्यु भोज जैसी प्रथाओं का विरोध
  • अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूकता
  • नशाखोरी के दुष्प्रभावों के प्रति जनजागरण
  • सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रसार

उन्होंने शिक्षा, नैतिकता और आध्यात्मिक जीवन को समाज की उन्नति का आधार माना।

108 कुण्डीय विष्णु महायज्ञ

संत देवाराम जी महाराज के नेतृत्व में 16 मई 1994 से 23 मई 1994 तक विश्व कल्याण, भारतीय सांस्कृतिक जागृति, पर्यावरण संरक्षण, कृषि विकास, किसान कल्याण तथा राष्ट्र की समृद्धि के उद्देश्य से 108 कुण्डीय श्री विष्णु महायज्ञ का आयोजन किया गया।

यह आयोजन उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।

ब्रह्मलीन

संत देवाराम जी महाराज ने लगभग 16 वर्षों तक अपने गुरु संत श्री राजारामजी महाराज की सेवा की तथा लगभग 54 वर्षों तक शिकारपुरा धाम के महंत के रूप में कार्य किया।

82 वर्ष की आयु में आषाढ़ वदी 2, संवत् 2053 को रात्रि लगभग सवा ग्यारह बजे वे ब्रह्मलीन हो गए।

उनकी समाधि शिकारपुरा धाम में संत श्री राजारामजी महाराज के मंदिर के सामने उत्तर दिशा में लगभग पचास मीटर की दूरी पर स्थित है। इनके बाद गुरु गादी की तीसरी पीढ़ी के रूप मे श्री किशनाराम जी महाराज ने समाज की सेवा की।

व्यक्तित्व और विचार

संत देवाराम जी महाराज का जीवन सेवा, विनम्रता, त्याग और समर्पण का आदर्श उदाहरण माना जाता है। वे मानव सेवा को ईश्वर सेवा के समान मानते थे।

उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह संदेश दिया कि सच्चा संत वही है जो समाज के दुःखों को समझे, लोगों को सही दिशा दे और धर्म को व्यवहारिक जीवन से जोड़े।

विरासत

संत देवाराम जी महाराज की विरासत आज भी शिकारपुरा धाम के माध्यम से जीवित है। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए सेवा, सत्संग, जनकल्याण और समाज सुधार के कार्य आज भी श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हैं।

राजस्थान की संत परंपरा में उनका नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।

स्रोत

  • राजेश्वर धाम ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित जीवन परिचय
  • शिकारपुरा धाम के ऐतिहासिक अभिलेख
  • संत श्री राजारामजी महाराज एवं शिकारपुरा परंपरा से संबंधित साहित्य

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