Shri Dayaram Ji Maharaj: Difference between revisions

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श्री दयाराम जी महाराज

जन्म ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, विक्रम संवत् 2025
जन्म स्थान खेड़ा खुर्द, तहसील रोहट, जिला पाली, राजस्थान
निवास श्री राजेश्वर धाम (शिकारपुरा), राजस्थान
शिक्षा दसवीं तक अध्ययन
व्यवसाय श्री राजेश्वर धाम के महंत
पिता अणदाराम जी
माता हरकूदेवी


श्री दयाराम जी महाराज राजस्थान के प्रमुख संत, समाज सुधारक तथा शिकारपुरा स्थित श्री राजेश्वर धाम के वर्तमान महंत हैं। उन्होंने अपने जीवन को धर्म, आध्यात्म, गुरु-सेवा, समाजोत्थान तथा जनकल्याण के लिए समर्पित किया। आश्रम के विकास, शिक्षा के प्रसार, समाज सुधार, नशामुक्ति अभियान तथा मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरोध में उनके योगदान के कारण वे राजस्थान सहित देशभर में सम्मानित संतों में गिने जाते हैं।

जन्म, प्रारंभिक जीवन और परिवार

श्री दयाराम जी महाराज का जन्म राजस्थान के पाली जिले की रोहट तहसील के खेड़ा खुर्द गांव में अणदाराम जी एवं हरकूदेवी के घर हुआ। उनके जन्म से जुड़ी एक विशेष धार्मिक मान्यता प्रचलित है। परिवार की परंपरा के अनुसार उनके जन्म से पूर्व जन्मा पहला पुत्र जन्म लेते ही दिवंगत हो गया था। अणदाराम जी ने गहरी श्रद्धा के साथ शिकारपुरा स्थित श्री राजेश्वर धाम पहुँचकर पूज्य देवाराम जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्हें आश्वासन दिया गया कि वही बालक पुनः जन्म लेगा, किंतु उसे आश्रम की सेवा के लिए समर्पित करना होगा।

लगभग नौ माह बाद जन्मे बालक का नाम डायाराम रखा गया। परिवार का विश्वास था कि यह वही बालक था जिसकी भविष्यवाणी पूर्व में की गई थी। इसी कारण बचपन से ही उनका जीवन सामान्य बालकों से अलग माना जाने लगा।

अणदाराम जी और हरकूदेवी को बाद में दो पुत्र महराराम एवं मोटाराम तथा तीन पुत्रियाँ गजरी देवी, गवरी देवी और पानी देवी की प्राप्ति हुई। परिवार में सभी का दयाराम जी के प्रति विशेष स्नेह था, किन्तु स्वयं दयाराम जी का स्वभाव बचपन से ही वैराग्यपूर्ण, सरल और मोह-मुक्त था।

बचपन

बालक दयाराम अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, जिज्ञासु और गंभीर स्वभाव के थे। बचपन में ही वे धार्मिक चर्चाओं में ऐसी बातें कह देते थे जिन्हें सुनकर बड़े-बुजुर्ग भी आश्चर्यचकित रह जाते थे। एक अवसर पर परमात्मा की कृपा पर चल रही चर्चा में उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म ही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है। उनकी इस बात से उपस्थित सभी लोग प्रभावित हुए और एक बुजुर्ग ने भविष्यवाणी की कि यह बालक आगे चलकर समाज को दिशा देगा तथा अपने परिवार और समाज का नाम रोशन करेगा।

बचपन में उन्हें फुटबॉल खेलना अत्यंत प्रिय था। वे गाय चराने जाते समय भी फुटबॉल साथ ले जाते थे। साथ ही उनमें बचपन से ही मितव्ययिता का गुण था। एक मेले में मिले पैसों में से खर्च करने के बाद भी उन्होंने कुछ राशि बचाकर अपने पिता को दिखाई। उन्होंने बताया कि बचत की शुरुआत जीवन में किसी न किसी दिन करनी ही होती है, इसलिए उन्होंने उसी दिन से इसकी शुरुआत की। उनकी इस सोच ने परिवार को अत्यंत प्रभावित किया।

उनकी माता हरकूदेवी का उनसे विशेष स्नेह था, किन्तु दयाराम जी का मन धीरे-धीरे सांसारिक मोह से ऊपर उठकर आध्यात्मिक जीवन की ओर आकर्षित होने लगा।

आश्रम जीवन

परिवार द्वारा दिए गए वचन के अनुसार बाल्यावस्था में ही दयाराम जी को शिकारपुरा स्थित श्री राजेश्वर धाम में समर्पित कर दिया गया। पूज्य देवाराम जी महाराज ने उन्हें अपने स्नेह और संरक्षण में रखा तथा आश्रम जीवन की शिक्षा दी।

आश्रम में उन्होंने गुरु-सेवा, संतों की सेवा, अतिथि सत्कार तथा धार्मिक अनुशासन को अपने जीवन का अंग बना लिया। वे नियमित रूप से मंदिर की सेवा करते, आश्रम की व्यवस्था समझते तथा प्रत्येक कार्य को सीखने का प्रयास करते थे। बचपन से ही उनमें अनुशासन, विनम्रता, सत्यनिष्ठा और सेवा भावना स्पष्ट दिखाई देने लगी थी।

पूज्य किशनाराम जी महाराज और पूज्य देवाराम जी महाराज ने उन्हें सत्य, सेवा, परिश्रम और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निरंतर मार्गदर्शन दिया। इन शिक्षाओं ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया और आगे चलकर यही उनके सार्वजनिक जीवन का आधार बनीं।

शिक्षा

आश्रम आने के बाद उनका प्रवेश शिकारपुरा विद्यालय में कराया गया, जहाँ विद्यालय में उनका नाम डायाराम से बदलकर दयाराम कर दिया गया। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा शिकारपुरा में प्राप्त की तथा आगे की पढ़ाई लूणी के उच्च माध्यमिक विद्यालय में की।

विद्यालय में वे अपने अच्छे व्यवहार, अनुशासन तथा सहपाठियों की सहायता करने की प्रवृत्ति के कारण लोकप्रिय रहे। आर्थिक अनुशासन और बचत की आदत उन्होंने विद्यार्थी जीवन में भी बनाए रखी तथा अपनी छोटी-छोटी बचत से बैंक खाता भी खुलवाया।

दसवीं कक्षा के दौरान आश्रम की बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई और वे आगे नियमित शिक्षा जारी नहीं रख सके। इसके बाद उन्होंने गुरु आज्ञा का पालन करते हुए अपना पूरा जीवन आश्रम सेवा और आध्यात्मिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।

आश्रम सेवा और व्यक्तित्व का विकास

औपचारिक शिक्षा समाप्त होने के बाद श्री दयाराम जी महाराज ने स्वयं को पूर्ण रूप से श्री राजेश्वर धाम की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने आश्रम की धार्मिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक व्यवस्थाओं को निकट से समझा और गुरुजनों के मार्गदर्शन में प्रत्येक कार्य को पूरी निष्ठा से सम्पन्न किया। वे आश्रम के आय-व्यय, निर्माण कार्यों, अतिथि सत्कार तथा दैनिक व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।

पूज्य देवाराम जी महाराज एवं पूज्य किशनाराम जी महाराज ने उन्हें सत्य, परिश्रम, अनुशासन, सेवा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निरंतर मार्गदर्शन दिया। इन्हीं शिक्षाओं ने उनके व्यक्तित्व को कर्मयोग, दूरदर्शिता और संगठन क्षमता से परिपूर्ण बनाया।

आश्रम विकास में योगदान

महंत बनने से पूर्व ही श्री दयाराम जी महाराज आश्रम के विकास कार्यों के प्रमुख सूत्रधार बन चुके थे। श्री राधा-कृष्ण मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा, निर्माण कार्यों की योजना, वित्तीय प्रबंधन तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं की जिम्मेदारी उन्होंने सफलतापूर्वक निभाई। उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर उन्हें निर्माण समितियों का दायित्व सौंपा गया।

उनके नेतृत्व में आश्रम में धर्मशाला, भोजनशाला, सत्संग भवन, कार्यालय, गोशाला, सड़कें, जल व्यवस्था, पार्किंग, विद्युत व्यवस्था, श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाएँ तथा अनेक स्थायी निर्माण कार्य सम्पन्न हुए। उन्होंने आश्रम की भूमि और संसाधनों के संरक्षण एवं विस्तार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा दूरदर्शिता के साथ अनेक स्थानों पर भूमि क्रय कर आश्रम की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि कराई।

हरिद्वार में पटेल समाज के लिए श्री राजाराम जी धर्मशाला के निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अतिरिक्त राजस्थान एवं गुजरात में छात्रावासों, शिक्षण संस्थानों तथा समाजोपयोगी निर्माण कार्यों को भी उन्होंने प्रोत्साहन दिया।

महंत पद पर आसीन

सद्गुरु श्री किशनाराम जी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात 22 जनवरी 2007 को श्री दयाराम जी महाराज सर्वसम्मति से श्री राजेश्वर धाम की गुरु गादी के महंत पद पर आसीन हुए। महंत बनने के बाद उन्होंने अपने गुरुजनों के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए धर्म, सेवा, शिक्षा और समाज सुधार को अपने कार्यों का प्रमुख आधार बनाया।

महंत पद ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने आश्रम के आधुनिकीकरण, श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार, धार्मिक आयोजनों के सुव्यवस्थित संचालन तथा समाजोत्थान के अनेक कार्यों को गति प्रदान की।

समाज सुधार

श्री दयाराम जी महाराज सामाजिक कुरीतियों के विरोधी रहे हैं। उन्होंने मृत्युभोज जैसी परंपराओं को आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से अनुचित बताते हुए उसमें सम्मिलित न होने का संकल्प लिया। उनका मानना है कि समाज की धनराशि का उपयोग शिक्षा, रोजगार, गरीबों की सहायता तथा समाज के विकास में होना चाहिए।

उन्होंने नशामुक्त समाज के निर्माण पर भी विशेष बल दिया। विशेष रूप से अफीम जैसी नशीली वस्तुओं के सेवन के विरुद्ध लोगों को जागरूक किया तथा युवाओं से नशामुक्त जीवन अपनाने का आह्वान किया। उनके विचार में समाज की वास्तविक उन्नति शिक्षा, सदाचार, आत्मानुशासन और सेवा भावना से ही संभव है।

शिक्षा एवं जनकल्याण

श्री दयाराम जी महाराज ने शिक्षा को समाज विकास का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उनके मार्गदर्शन में छात्रावासों, शिक्षण संस्थानों तथा विद्यार्थियों के लिए अनेक सुविधाओं का विकास हुआ। उन्होंने विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं को आर्थिक सहयोग प्रदान किया तथा बालिका शिक्षा को भी प्रोत्साहित किया।

इसके अतिरिक्त आश्रम में समय-समय पर चिकित्सा शिविर, नेत्र चिकित्सा, सामान्य स्वास्थ्य सेवाएँ तथा अन्य जनकल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित कराए जाते रहे हैं।

प्रमुख उपलब्धियाँ

  • श्री राजेश्वर धाम के महंत के रूप में आश्रम के व्यापक विकास का नेतृत्व।
  • धर्मशाला, भोजनशाला, सत्संग भवन, पार्किंग, गोशाला एवं अनेक आधुनिक सुविधाओं का निर्माण।
  • हरिद्वार में श्री राजाराम जी धर्मशाला के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान।
  • शिक्षा संस्थानों, छात्रावासों एवं समाजोपयोगी निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन।
  • मृत्युभोज और नशाखोरी जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनजागरण।
  • समाज सेवा, धार्मिक आयोजन तथा जनकल्याण के अनेक कार्यों का संचालन।

व्यक्तित्व और विचार

श्री दयाराम जी महाराज सादगी, अनुशासन, मितव्ययिता, सेवा भावना और कर्मयोग के लिए जाने जाते हैं। उनका विश्वास है कि व्यक्ति को सत्य, परिश्रम और सदाचार के मार्ग पर चलते हुए समाज के हित में कार्य करना चाहिए। वे धन के सदुपयोग, शिक्षा के प्रसार, समाज की एकता और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण पर विशेष बल देते हैं।

निष्कर्ष

श्री दयाराम जी महाराज ने अपने गुरुजनों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए धर्म, समाज सेवा, शिक्षा, निर्माण कार्य और सामाजिक सुधार के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके नेतृत्व में श्री राजेश्वर धाम केवल एक धार्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि शिक्षा, सेवा और समाजोत्थान का भी प्रमुख केंद्र बना है। उनका जीवन त्याग, सेवा, अनुशासन और लोककल्याण की प्रेरणा देता है।

स्रोत

  • श्री दयाराम जी महाराज जीवन वृत्त (प्रकाशित जीवनी)
  • श्री राजेश्वर धाम, शिकारपुरा

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