Shri RajaRam Ji Bhagwan: Difference between revisions

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श्री राजारामजी महाराज ने संसारियों को अज्ञानता से ज्ञानता की ओर लाने के उद्देश्य से बच्चों को पढाने लिखाने पर जोर दिया। आपने जाति, धर्म, रंग आदि भेदों को दूर करने के लिए समय-समय पर अपने व्याख्यान दिये और बाल विवाह, कन्या विक्रय, मृत्युभोज जैसी समाज की बुराईयों का अंत करने का अथक प्रयत्न किया। आपने लोगों को नशीली वस्तुओं के प्रयोग से कोसों दूर रहने का उपदेश दिया और शोषण विहीन होकर ६ र्मात्माओं की तरह समाज में रहने का पथ प्रदर्शन किया। आप एक अवतार थे, इस संसार में आये और समाज के कमजोर वर्ग की सेवा करते हुए श्रावण वद 14 संवत 2000 को इस संसार को त्याग करने के उद्देश्य से जीवित समाधि लेकर चले गये।  
श्री राजारामजी महाराज ने संसारियों को अज्ञानता से ज्ञानता की ओर लाने के उद्देश्य से बच्चों को पढाने लिखाने पर जोर दिया। आपने जाति, धर्म, रंग आदि भेदों को दूर करने के लिए समय-समय पर अपने व्याख्यान दिये और बाल विवाह, कन्या विक्रय, मृत्युभोज जैसी समाज की बुराईयों का अंत करने का अथक प्रयत्न किया। आपने लोगों को नशीली वस्तुओं के प्रयोग से कोसों दूर रहने का उपदेश दिया और शोषण विहीन होकर ६ र्मात्माओं की तरह समाज में रहने का पथ प्रदर्शन किया। आप एक अवतार थे, इस संसार में आये और समाज के कमजोर वर्ग की सेवा करते हुए श्रावण वद 14 संवत 2000 को इस संसार को त्याग करने के उद्देश्य से जीवित समाधि लेकर चले गये।  


आपकी समाधि के बाद आपके प्रधान शिष्य श्री देवारामजी महाराज को आपके उपदेशों का प्रसार व प्रचार करने के उद्देश्य से आपकी गद्दी पर बिठाया और महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया । महंत श्री देवारामजी ने आजकल अपने गुरुभाई श्री लच्छीरामजी, गणेशरामजी और शंभूरामजी के साथ भ्रमण करते हुए श्री राजारामजी महाराज के उपदेशों को संसारियों तक पहुंचाने का प्रयत्न करने में अपना जीवन लगा दिया है, जो आधुनिक साधुओं का आजकल के समाज के प्रति मूल कर्तव्य है। महंत श्री देवारामजी के प्रद्दान शिष्य श्री किशनारामजी आचार्य, शिष्य श्री भोलारामजी भी क्रमशः अपने विद्वतायुक्त व्याख्यानों और भावनायुक्त हरिभजनों द्वारा श्री गुरूजी के अधूरे काम को पूरा करने में अपना जीवन लगाकर अथक प्रयत्न करते रहे हैं, जिसके लिए श्री राजारामजी महाराज संप्रदाय समाज आपका ऋणी रहेगा।
आपकी समाधि के बाद आपके '''प्रधान शिष्य [[Shri Devaram Ji Maharaj|श्री देवारामजी महाराज]]''' को आपके उपदेशों का प्रसार व प्रचार करने के उद्देश्य से आपकी गद्दी पर बिठाया और महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया । महंत श्री देवारामजी ने आजकल अपने गुरुभाई श्री लच्छीरामजी, गणेशरामजी और शंभूरामजी के साथ भ्रमण करते हुए श्री राजारामजी महाराज के उपदेशों को संसारियों तक पहुंचाने का प्रयत्न करने में अपना जीवन लगा दिया है, जो आधुनिक साधुओं का आजकल के समाज के प्रति मूल कर्तव्य है। महंत श्री देवारामजी के '''प्रद्दान शिष्य [[Shri Kishnaram Ji Maharaj|श्री किशनारामजी]]''' आचार्य, शिष्य श्री भोलारामजी भी क्रमशः अपने विद्वतायुक्त व्याख्यानों और भावनायुक्त हरिभजनों द्वारा श्री गुरूजी के अधूरे काम को पूरा करने में अपना जीवन लगाकर अथक प्रयत्न करते रहे हैं, जिसके लिए श्री राजारामजी महाराज संप्रदाय समाज आपका ऋणी रहेगा।


श्री देवारामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद श्री किशनारामजी महाराज को गादीपति से विभूषित किया गया। श्री किशनारामजी महाराज ने समाज को एक धागे में पिरोकर पूरे देश में दूर दूर फैले आंजणा समाज को एक मंच प्रदान कर गुरूजी की दी शिक्षाओं का प्रसार प्रचार किया एवं समाज सेवा करते करते 6 जनवरी 2007 को देवलोकगमन कर गये।  
श्री देवारामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद [[Shri Kishnaram Ji Maharaj|श्री किशनारामजी महाराज]] को गादीपति से विभूषित किया गया। श्री किशनारामजी महाराज ने समाज को एक धागे में पिरोकर पूरे देश में दूर दूर फैले आंजणा समाज को एक मंच प्रदान कर गुरूजी की दी शिक्षाओं का प्रसार प्रचार किया एवं समाज सेवा करते करते 6 जनवरी 2007 को देवलोकगमन कर गये।  


वर्तमान में आश्रम में गुरूगादी की चौधी पीढी के रूप में श्री दयारामजी महाराज को महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया । नव गादीपति श्री दयारामजी महाराज महंत है, लग्नशील है अतः आपके सानिध्य में समाज चहुंमुखी विकास के पथ पर आगे बढ रहा है एवं गुरूजी के दिये उपदेशों का प्रसार-प्रचार कर रहे हैं।
वर्तमान में आश्रम में गुरूगादी की चौधी पीढी के रूप में '''श्री दयारामजी महाराज''' को महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया । नव गादीपति श्री दयारामजी महाराज महंत है, लग्नशील है अतः आपके सानिध्य में समाज चहुंमुखी विकास के पथ पर आगे बढ रहा है एवं गुरूजी के दिये उपदेशों का प्रसार-प्रचार कर रहे हैं।


== सोर्स - ==
== सोर्स - ==

Latest revision as of 13:40, 21 July 2026


श्री राजारामजी महाराज

जन्म चैत्र शुक्ल 9 संवत 1939
जन्म स्थान शिकरपुरा, जोधपुर, राजस्थान, भारत
निवास शिकरपुरा धाम, जोधपुर, राजस्थान, भारत
शैक्षिक योग्यता आध्यात्मिक शिक्षा
व्यवसाय संत, आध्यात्मिक गुरु
पिता श्री हरींगरामजी
माता मोतीबाई
आधिकारिक वेबसाइट वेबसाइट


श्री राजारामजी महाराज (shri Rajaram ji Maharaj shikarpura Dhaam) का जन्म चैत्र शुक्ला 9 संवत 1939 को, जोधपुर लूनी के गांव शिकारपुरा में, आंजणा कलबी वंश की सिहं खांप में एक गरीब किसान के घर हुआ था। जिस समय आपकी आयु लगभग दस वर्ष की थी आपके पिता श्री हरींगरामजी का देहांत हो गया और उसके कुछ समय बाद आपकी माता श्रीमती मोतीबाई का भी स्वर्गवास हो गया।

माता- पिता के मृत्योपरांत आपके बड़े भाई श्री रघुनाथरामजी नंगे सन्यासियों की जमात में चले गये और आप कुछ समय तक अपने चाचा श्री थानारामजी व कुछ समय अपने मामा श्री मादारामजी भूरिया, गांव धांधिया के पास रहने लगे। बाद में शिकारपुरा के रबारियों की सांडियों रोटी कपड़ो के बदले एक साल तक चराई और गांव की गांये भी बिना हाथ में लाठी लिये नंगे पाव दो साल तक राम रटते चराई।

श्री राजाराम जी महाराज की आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत

गांव की खाली छोड़ने के बाद आपने गांव के ठाकुर के घर 12 रोटियां प्रतिदिन व कपड़ों के बदले हाली का काम संभाल लिया। इस समय आपके होठ केवल ईश्वर के नाम रटने में ही हिला करते थे। एक दिन आपके मन में दान पुण्य करने का विचार आया लेकिन आप एक संपति रहित व्यक्ति होने के कारण दान पुण्य में देने के लिए अपने पास अन्य कोई वस्तु न देखकर अपने को मिलने वाले भोजन का आधा भाग नियमित रूप से कुत्तो को डालना शुरू कर दिया। जिसकी शिकायत ठाकुर से होने पर ठाकुर ने 12 सोगरा के स्थान पर 6 सोगरा, फिर 6 से 3 सोगरां व 3 सोगरा व 3 से 1 सोगरा ही प्रतिदिन भेजना शुरू कर दिया। लेकिन दानवीर ने दानशीलता न छोड़ी और आधा भाग नियमित रूप से कुत्तो को डालते ही रहे।


इस प्रकार की ईश्वर भक्ति और दानशील स्वभाव से प्रभावित होकर देव भारती नाम के एक पहुंचवान बाबाजी ने (जो शिकारपुरा के तालाब पर मीठानीयां बेरे के पास, जिस पर श्री राजारामजी रिजका पिलाने का काम करते थे अपना आसन मण्डी पर जमाकर रहा करते थे) एक दिन श्री राजारामजी को अपना सच्चा सेवक समझकर अपने पास बुलाया और अपनी रिद्धि सिद्धि श्री राजारामजी को देकर उन बाबाजीने जीवित समाधि ले ली।

उसी दिन उधर ठाकुर ने विचार किया कि राजिया (श्री राजारमाजी का ग्रामीण नाम) को वास्तव में एक रोटी प्रतिदिन कम ही है और किसी भी व्यक्ति को जीवित रहने के लिए काफी नहीं है। अतः ठाकुर ने आपके भोजन की मात्रा फिर से निश्चित करने के उद्देश्य से उन्हे अपने घर भोजन करने बुलाया ।

शाम के समय श्री राजारामजी ईश्वर का नाम लेकर ठाकुर के यहां भोजन करने के लिए गये। आपने बातो ही बातों में साढ़े सात किलो वजन के आटे के सोला सोगरा अरोग ली फिर भी आपको भूख मिटाने का आभास नहीं हुआ । ठाकुर व उसकी पत्नी यह देखकर अचरज करने लगे। उसी दिन शाम को श्री राजारामजी अपना हाली का धंधा ठाकुर को सौंपकर तालाब पर जोगमाया के मंदिर में आकर राम नाम रटने बैठ गये। उधर गांव के लोगो को चमत्कार का समाचार मिलने पर उनके दर्शनो के लिए आने का तांता बंध गया।

श्री राजाराम जी महाराज की द्वारका यात्रा और चमत्कार

दूसरे दिन आपने द्वारका तीर्थ करने का विचार किया और आप दंडवंत करते करते द्वारका रवाना हुए। पांच दिनों में शिकारपुरा से पारलू पहुंचे और एक पीपल के पेड़ के नीचे हजारो नर नारियों के बीच अपना आसान जमाया और उनके बीच से एकाएक इस प्रकार गायब हुए कि किसी को पता न लगा।


दस मास बाद द्वारका तीर्थ कर आप शिकारपुरा में जोगमाया के मंदिर में प्रकट हुए और अदभूत चमत्कारी बाते करने लगे, जिस पर विश्वास कर लोग उनकी पूजा करने लग गये । आपको जब लोग अधिक परेशान करने लग गये तो आपने 6 मास का मौन व्रत रखा। जब आपने शिवरात्रि के दिन मौन व्रत खोला उस समय उपस्थित अस्सी हजार नर नारियों को व्याख्यान दिया और अनेक चमतकार बताये जैसे

तालाब पानी से भरा

मरे हुए बकरे को जिंदा किया

कुदरती गुफा का निर्माण

जोधपुर नरेश को चमत्कार दिया

पानी मे नामक मिलकर मीठा किया

शंख अपने आप बजा

मरे हुए हिरण को जिंदा किया

जोधपुर नरेश को पोलो जीतने का वचन दिया

नांगा की जमात को पथर से चिपकाया

पानी मे पथर तैराया

जेठमल को बुढ़ापा मे पुत्र दिया

इस प्रकार के कुछ 41 से ज्यादा चमत्कार किए।


महादेवजी के उपासक होने के कारण आपने शिकारपुरा तालाब पर एक महादेवजी का मंदिर बनवाया, जिसको आजकल हम श्री राजारामजी के जुना मंदिर के नाम से पुकारते है । जिसकी प्रतिष्ठा करते समय अपने भाविकों व साधुओं का सत्कार करने के लिए प्रसाद के स्वरूप नाना प्रकार के पकवान बनवाये जिसमें 250 क्विंटल घी खर्च किया गया। उस मंदिर के बन जाने पर आपके बड़े भाई रघुनाथरामजी भी जमात से पधार गये और दो साल साथ साथ तपस्या करने के बाद श्री रघुनाथरामजी ने समाधि ले ली। आपके भाई की समाधि के बाद आपने अपने स्वयं के रहने के लिए एक बगीची बनाई, जिसको आजकल श्री राजारामजी आश्रम के नाम से पुकारा जाता है ।

श्री राजारामजी महाराज के उपदेश और शिक्षाएं

श्री राजारामजी महाराज ने संसारियों को अज्ञानता से ज्ञानता की ओर लाने के उद्देश्य से बच्चों को पढाने लिखाने पर जोर दिया। आपने जाति, धर्म, रंग आदि भेदों को दूर करने के लिए समय-समय पर अपने व्याख्यान दिये और बाल विवाह, कन्या विक्रय, मृत्युभोज जैसी समाज की बुराईयों का अंत करने का अथक प्रयत्न किया। आपने लोगों को नशीली वस्तुओं के प्रयोग से कोसों दूर रहने का उपदेश दिया और शोषण विहीन होकर ६ र्मात्माओं की तरह समाज में रहने का पथ प्रदर्शन किया। आप एक अवतार थे, इस संसार में आये और समाज के कमजोर वर्ग की सेवा करते हुए श्रावण वद 14 संवत 2000 को इस संसार को त्याग करने के उद्देश्य से जीवित समाधि लेकर चले गये।

आपकी समाधि के बाद आपके प्रधान शिष्य श्री देवारामजी महाराज को आपके उपदेशों का प्रसार व प्रचार करने के उद्देश्य से आपकी गद्दी पर बिठाया और महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया । महंत श्री देवारामजी ने आजकल अपने गुरुभाई श्री लच्छीरामजी, गणेशरामजी और शंभूरामजी के साथ भ्रमण करते हुए श्री राजारामजी महाराज के उपदेशों को संसारियों तक पहुंचाने का प्रयत्न करने में अपना जीवन लगा दिया है, जो आधुनिक साधुओं का आजकल के समाज के प्रति मूल कर्तव्य है। महंत श्री देवारामजी के प्रद्दान शिष्य श्री किशनारामजी आचार्य, शिष्य श्री भोलारामजी भी क्रमशः अपने विद्वतायुक्त व्याख्यानों और भावनायुक्त हरिभजनों द्वारा श्री गुरूजी के अधूरे काम को पूरा करने में अपना जीवन लगाकर अथक प्रयत्न करते रहे हैं, जिसके लिए श्री राजारामजी महाराज संप्रदाय समाज आपका ऋणी रहेगा।

श्री देवारामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद श्री किशनारामजी महाराज को गादीपति से विभूषित किया गया। श्री किशनारामजी महाराज ने समाज को एक धागे में पिरोकर पूरे देश में दूर दूर फैले आंजणा समाज को एक मंच प्रदान कर गुरूजी की दी शिक्षाओं का प्रसार प्रचार किया एवं समाज सेवा करते करते 6 जनवरी 2007 को देवलोकगमन कर गये।

वर्तमान में आश्रम में गुरूगादी की चौधी पीढी के रूप में श्री दयारामजी महाराज को महंत श्री की उपाधि से विभूषित किया गया । नव गादीपति श्री दयारामजी महाराज महंत है, लग्नशील है अतः आपके सानिध्य में समाज चहुंमुखी विकास के पथ पर आगे बढ रहा है एवं गुरूजी के दिये उपदेशों का प्रसार-प्रचार कर रहे हैं।

सोर्स -

  • ग्रंथ - संत शिरोमणि श्री राजारामजी के उपदेश
  • ग्रंथ - श्री राजेश्वरधाम एक पावन तीर्थ

Category महापुरुष